Featured

सड़क….

Innovations-in-Transportation-Open-New-Roads-for-ETF-Investors-915x510

चमक अलग है !

इस नई सड़क की चमक अलग है

दमक अलग है !

कंकड़ की काली दमक अलग है…

पर नहीं अलग हैं, कहानियाँ दो

हैं मुझे दिखाई देती जो ।

बहुत लम्बा सफ़र तय कर सकते हैं,

लगता है कुछ यूँ ही तो ….

इस नई सड़क पर

और पहले प्यार में भी ।

मुस्कुराहटें बिखर जाती हैं ,

दोनों में ही…..

किसी के आने पर ।

पर यथार्थ से जब होते हैं रूबरू

तो सोचें, लगी हुई है आग क्यों ?

क्योंकि सड़क लगे पिघली सी अब

और हमारे होश फ़ाक्ता हो आते हैं ।

कुछ चंद फेरे समय के,

दोनों को ही याद दिला जाते हैं ,

उनकी असली औकात उन्हें ।

बात सही भी है,

नया, नया नहीं रहता

रह जाती है तो बस एक टीस,

एक अंतराल के बाद ।

कभी देखी है सड़क खड्डों से भरी ?

कुछ ऐसा ही हो जाता हाल…..

मन के धरातल का, स्नेह में ।

विरोधाभास करते हैं गहरा ,

और भी, उन गड्ढों को ।

मानो जैसे सड़कों में वो नहीं

बल्कि उन में सड़कें हों ।

जो लोप हुआ था, “मैं” का “तुम” में

बनने को “हम”,

अब लगने लगे ठगी-सा

उस से थोड़ा-सा कम ।

जो शुरू हुआ हँसते-हँसते ,

बिन चाहा कोई कर्ज़ लगे ।

जो दिखे नहीं , पर दर्द करे,

वहमी-सा कोई मर्ज लगे ।

पर अंत हुआ है कभी किसी का

पूरी तरह से , अकस्मात ?

रखे बचाकर मलबे से, 

अवशेष लगे जो मेरे हाथ ।

                                                                                    – निर्मोही अज्ञेय

Advertisements

और सब बहाने थे….

  • जब मुस्कुराने को वजाहें, हो गईं ओझल….

तो सोचते, फिर से,

पलटकर, दिन ये आने थे।

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब खर्च करने को, बचा न एक भी कतरा…

तो डूबकर-तरकर,

कहाँ ये जिस्म जानें थे?

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब हुए तुम ज़ब्त, और तुमने, खंगाले “बक्स-अल्फ़ाज़ी”…

तो तमगे क्यों कमाए थे,

जहाँ लम्हें कमाने थे?

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब कराहते, फूटे छालों से, पैदल चल रहे थे तुम..

तो पागल थे, जो जलते कोयले,

जूतों में लाने थे!

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब शब् ढ़ली, और थी जली, एक “चंद-रोज़ा लौ” ….

तो चिराग़-ऐ-आरज़ू क्यों थी?

जो बेहिस यों भुजाने थे।

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब तुमको, घर ही था जाना, इतनी दूर तक आ कर…..

तो निकले क्यों सफ़र-अन्जान पर?

जब खो ही जाने थे।

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

  • जब फ़िक्र और फ़िराक में, मालूम न हो फ़र्क…

तो किस फ़ख्र से तुमको,

ये बाकी दिन बिताने थे?

कहूँ क्या ? सब बहाने थे।

✍ निर्मोही अज्ञेय