
चमक अलग है !
इस नई सड़क की चमक अलग है
दमक अलग है !
कंकड़ की काली दमक अलग है…
पर नहीं अलग हैं, कहानियाँ दो
हैं मुझे दिखाई देती जो ।
बहुत लम्बा सफ़र तय कर सकते हैं,
लगता है कुछ यूँ ही तो ….
इस नई सड़क पर
और पहले प्यार में भी ।
मुस्कुराहटें बिखर जाती हैं ,
दोनों में ही…..
किसी के आने पर ।
पर यथार्थ से जब होते हैं रूबरू
तो सोचें, लगी हुई है आग क्यों ?
क्योंकि सड़क लगे पिघली सी अब
और हमारे होश फ़ाक्ता हो आते हैं ।
कुछ चंद फेरे समय के,
दोनों को ही याद दिला जाते हैं ,
उनकी असली औकात उन्हें ।
बात सही भी है,
नया, नया नहीं रहता
रह जाती है तो बस एक टीस,
एक अंतराल के बाद ।
कभी देखी है सड़क खड्डों से भरी ?
कुछ ऐसा ही हो जाता हाल…..
मन के धरातल का, स्नेह में ।
विरोधाभास करते हैं गहरा ,
और भी, उन गड्ढों को ।
मानो जैसे सड़कों में वो नहीं
बल्कि उन में सड़कें हों ।
जो लोप हुआ था, “मैं” का “तुम” में
बनने को “हम”,
अब लगने लगे ठगी-सा
उस से थोड़ा-सा कम ।
जो शुरू हुआ हँसते-हँसते ,
बिन चाहा कोई कर्ज़ लगे ।
जो दिखे नहीं , पर दर्द करे,
वहमी-सा कोई मर्ज लगे ।
पर अंत हुआ है कभी किसी का
पूरी तरह से , अकस्मात ?
रखे बचाकर मलबे से,
अवशेष लगे जो मेरे हाथ ।
































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