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सड़क….

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चमक अलग है !

इस नई सड़क की चमक अलग है

दमक अलग है !

कंकड़ की काली दमक अलग है…

पर नहीं अलग हैं, कहानियाँ दो

हैं मुझे दिखाई देती जो ।

बहुत लम्बा सफ़र तय कर सकते हैं,

लगता है कुछ यूँ ही तो ….

इस नई सड़क पर

और पहले प्यार में भी ।

मुस्कुराहटें बिखर जाती हैं ,

दोनों में ही…..

किसी के आने पर ।

पर यथार्थ से जब होते हैं रूबरू

तो सोचें, लगी हुई है आग क्यों ?

क्योंकि सड़क लगे पिघली सी अब

और हमारे होश फ़ाक्ता हो आते हैं ।

कुछ चंद फेरे समय के,

दोनों को ही याद दिला जाते हैं ,

उनकी असली औकात उन्हें ।

बात सही भी है,

नया, नया नहीं रहता

रह जाती है तो बस एक टीस,

एक अंतराल के बाद ।

कभी देखी है सड़क खड्डों से भरी ?

कुछ ऐसा ही हो जाता हाल…..

मन के धरातल का, स्नेह में ।

विरोधाभास करते हैं गहरा ,

और भी, उन गड्ढों को ।

मानो जैसे सड़कों में वो नहीं

बल्कि उन में सड़कें हों ।

जो लोप हुआ था, “मैं” का “तुम” में

बनने को “हम”,

अब लगने लगे ठगी-सा

उस से थोड़ा-सा कम ।

जो शुरू हुआ हँसते-हँसते ,

बिन चाहा कोई कर्ज़ लगे ।

जो दिखे नहीं , पर दर्द करे,

वहमी-सा कोई मर्ज लगे ।

पर अंत हुआ है कभी किसी का

पूरी तरह से , अकस्मात ?

रखे बचाकर मलबे से, 

अवशेष लगे जो मेरे हाथ ।

                                                                                    – निर्मोही अज्ञेय

कोढ़

घुलता मिलता सा ज़हर कहीं,
कहते हैं जिसको इश्क सभी
ज़ाया होना तब इल्म हुआ,
रूह कैद करी, आज़ाद कई !

लीचें लग जाती हों जैसे,
ये नशा उतरता है कैसे ?
बर्बाद मुनासिब लफ्ज़ नहीं,
अर्शों से फर्शों ला फेंके !

एक अजब गुमान ले घूम रहे,
सारे रोगी क्यों झूम रहे ?
जिसने खंजर से गोद दिया,
उसके हाथों को चूम रहे !

मसरूफ हुए सब धंधों में,
क्यों खुदा ढूंढते बंदों में ?
रीढ़ें गिरवी रख आए जो,
खोजे जन्नत उन कंधों में ?

– निर्मोही अज्ञेय

क्या बुराई है ?

जब भी कभी लगता है
कि कुछ नया हो रहा है
नयेपन का आनंद लेते हुए
मन करता है , कि इसको पन्नों पर उतार लिया जाए
ठीक इस मिनट , जब कलम उठाकर
हम लिखने बैठते हैं , तब
न हम नएपन के रह पाते हैं
और न ही लिखने के !
अजब अनोखापन है , इस पूरे एपिसोड में ।
मुझे लगता है, की मैंने कलम से पकड़ कर लम्हों को
पन्नों पर सहेज लिया है
जैसे कोई जीवाश्म सहेजे म्यूज़ियम में रखता है ,
मेरी डायरियों में भी लम्हे कैद होने ही चाहिए ,
ताकि उस थोड़े से जीए को मैं
इस नाकाफ़ी से जीने में , बार बार जी सकूं ।
लाजवाब बात ये भी है , कि लम्हों को लगता है –
हम जो तारों की भांति इसे दिख रहे हैं ,
सचमुच तो हम बीत चुके हैं,
न लौटने के लिए !
ये जो चमकता सा इसे दिखाई दे रहा है
वो तो हमारा ‘होना’  हुआ करता था
जो अब है ही नहीं ,
फिर भी , इसको खुश रखने में , क्या बुराई है ?

✍️ निर्मोही अज्ञेय

मालुमात

रातों को चाय का कप थामे,
मैं बालकनी में खड़े हुए
ताकती हूं, तबियत से –
कुछ बंद कमरों की बंद खिड़कियां
कुछ बंद घरों में बंद कहानियां ।
क्योंकि देखा है मैंने, चांद को
मुझे ताकते हर रोज़,
आसमां की उन पारदर्शी खिड़कियों से,
जिन्हें मैं और तुम , देख नहीं पाते ।
खैर, मुझे यकीन है, की ये चांद भी
कोई भटका सा लेखक या कवि है ,
जो जुटा रहा है, जीवन और उसके साक्ष्य
रचनाओं में बुनकर लिखने को ।
सहेज रहा है, हिम्मत के हथियार,
चांद भी, देकर धार,
शब्दों के स्वयंवर में बिकने को !

✍️ निर्मोही अज्ञेय

लिखना क्यों चाहिए?

क्योंकि उंगलियां अब,
दौड़ने लगी हैं कीपैड के मैराथन,
पर महीनों से दराज़ में पड़ी
कलम की स्याही,
सूख रही है और
कलम भूल गई है,
उंगलियों के स्पर्श की गर्माहट।

क्योंकि कह कह कर,
मार ड़ाले हैं, हमने
झुण्ड शब्दों के ,
और रेडियो से बज रहें है,
वर्णमाला के बच्चे,
जिन्हें अनाथ छोड़ देते हैं सभी,
पर ध्यान लगाकर सुनता कोई नहीं।

क्योंकि उम्र के जाड़े में
जब गुनगुनी धूप तलाशते हुए ,
हमारे हौसले जमने लगते हैं,
तब शब्दों के ये श्वेत – स्याह कम्बल,
बचा लेते हैं, सत्व हम में
मशीनियत की ठिठुरन से ।

क्योंकि जब कभी ज़ुबान
लंगड़ी होकर , कह नहीं पाती,
वो जो हम महसूस करते हैं,
तो कलम को बैसाखी बना लेने से,
हमारे शब्द चलते नहीं दौड़ते हैं,
और फिर पंखों के बिना भी,
दूर तक उड़कर जाते हैं,
विलुप्त-प्राय पक्षिओं की भांति,
गुमनाम चिट्ठियों में ।

यकीनन, लिख पाना ही मोक्ष है !

✍️ निर्मोही अज्ञेय

अन्तर्द्वंद

औदार्य का सौंदर्य , मलीन है, मुक्ति के मैल से ,
मैं विचार मग्न हूं, विवेचन में ।
मेरे  अस्तित्व को अखरता है, ये ठहराव ,
पुर्णविराम से कम , किन्तु अर्द्धविराम से ज़्यादा  ।
खुदी के खुदा , खुदबखुद , ओझल हैं ,
क्योंकि मेरे सवालों की फेहरिस्त,
अब उनसे संभाली नहीं जाती ।
वो थक गए है मेरे अथक प्रश्नों के उत्तर देते हुए,
पर मेरी प्रारब्ध से परे करने की पिपासा, मिटती ही नहीं !
                                                         ✍️निर्मोही अज्ञेय

विवेचन

इश्क़ हमेशा ज़रखेज़ होता है
मुझे ऐसा पहाड़ों ने बताया है,
क्या हुआ अगर पत्ते टिकते नहीं पौधों पर,
लेकिन जड़ें वहीं टिकी हैं पौधों की ।
पानी जमेगा , पिघलेगा, और फिर
खैर बहना तो स्वभाव है उसका ,
पर जिस नदी में भी जाए,
नाम उसका पर्वतमाला से ही जोड़ा जाएगा ।
इश्क़ में शहर और इश्क़ में बाग होना तो सुना है,
पर इश्क़ में पहाड़ होना , एक अलग माजरा है !
वहीं रहना है, स्थिर , अटल , और ज़रखेज़
लोग और वक़्त कहेंगे- भैया निकल लो इंहा से
पर तुम टिके रहना , क्योंकि
तुम्हारा प्यार पहाड़ है !

मिट्टी

मिट्टी में खेलना, मिट्टी में चलना
और अंत में मिट्टी में मिल जाना !
ये मिट्टी ही तो है,
जो मुझे, तुम्हें , हम सभी को,
जोड़े रखती है, हमारे बचपन से !
मैं उन्हीं लापता हुई,
चहलकदमियों  के निशान,
खोजना चाहती हूं,
टटोलना चाहती हूं ।
पर ये मिट्टी भी ज़िद्दी है,
वो उन कदमों की छाप को भी ,
खुद में खुद सा समाहित कर लेती है ।
आखिरकार , इतनी आत्मीयता लाती कहां से है?
अभी खिड़की से बारिश देख रही हूं,
ये जो आसमां इसपर बरस रहा है,
कभी बूंद बूंद , कभी मूसलाधार ,
ये उसके अंश भी खुद में ले लेगी ,
सारोबर जो है , एक बाल सुलभ नेह से !
फिर महक उठेगी कैसे !
सौंधी – सौंधी, पनियल मिट्टी ।
उसे मालूम ही नहीं,
अपने – पराए का फ़र्क !
जब हम सुपुर्द- ए – खाक  होते हैं ,
तो असल में, मिट्टी ही हमें अपनाती है
अपनों से विदा लेने के बाद भी !
“मिट्टी में मिल जाना” बताता है,
की उसके बाहूपाश हमेशा खुले हैं,
हमारे लिए, चाहे हम कैसे भी हो, कहीं से भी हो ।
इसलिए , मेरे मित्र,
कृतज्ञतावश ही सही, किन्तु
मिट्टी से जुड़ें रहना बहुत ज़रूरी है !
                                                  ✍️ निर्मोही अज्ञेय

रोज़ाना

नींद आ रही है,
पर नींद से भी ज़्यादा, इन आंखों में,
किसी चलचित्र की भांति, आ रहे हैं लम्हें,
तुम्हारी मुस्कुराहटें लिए !
क्योंकि आसमान का कम्बल ओढ़े,
तारों में हमारे निशान तलाशते
सोती हूं मैं, रोज़ाना ।

क्योंकि, मेरे आसमान, समंदर
और जो कुछ भी इनके बीच आता है,
जो कुछ होता है और  जो कुछ नहीं भी ,
सबकुछ तुम ही हो !
तुम्हे लपेटे सोना, अच्छा लगता है
मेरी यादों में, रोज़ाना ।

तुम्हारे सामिप्य की चादर बिछाए,
तुम्हारी खिलखिलाहट की लोरी सुनते हुए,
तुम्हारे आगोश में, ना-होश होना,
और तुम्हारे पास ना होते हुए भी,
मेरा, तुम में हर बार खोना !
अठखेलियां करती, मेरे ज़ेहन में
खुशबुएं तुम्हारी , रोज़ाना ।

चलो, सो लेती हूं,
तुम में, तुम्हारे सपनों में,
शामिल हो लेती हूं,
क्योंकि वक़्त है अभी,
वो वक़्त आने में,
जब मैं और तुम,सिर्फ कहानी नहीं,
हकीकत होंगे, एक दूसरे की
और रोज़ाना तब्दील हो जाएगा ,
हमेशा में !

– निर्मोही अज्ञेय

Dipping sun

Haan, Main Gulzaar Nahi hu…..

Jo likhkr ke , krde kaayal,

Chedu main, aise taar, nahi hu.

Haan,

Main Gulzaar nahi hu…..

Naa nafrat karta, mujhse koi

Lekin, Main pyaar nahi hu.

Haan,

Main Gulzaar nahi hu…..

Kuch kishto-se, rishto mein

Tukda-tukda, Ambaar nahi hu.

Haan,

Main Gulzaar nahi hu…..

Kyu, taak mein Meri, roza rkhkr?

Main Tera Iftaar nahi hu.

Haan,

Main Gulzaar nahi hu…..

Bikhre-bikhraa, bandhdh pau naa

Haara-sa, Main, Wo Haar, Nahi hu.

Haan,

Main Gulzaar nahi hu…..

Nirmohi Agyay

Q ??? (Halanki mera prash-chinh adrishya hai, apne aadam-kad ke chalte)

Q paa nhi skte kbhi hum sabkuch, Paa kr sbkuch bhi.

Q “humesha” humesha nhi hota
Aur Q nhi jaa pate hum jaane ki chah rkhte huye bhi

Q hota hai aksar ki lafz alfaz bane hi dum tod dete hai,
Labo ki dehleez laanghna unko guzartaa hai naagawaar shayad

Jo chlte toh hai , bahut dur tk pahunchne ko aksar,
Par simat jaate hain, raaste ko hi manzil maankr…..

✍Nirmohi Agyey

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